Posts

शेर और ऊंट की कहानी।

एक घने जंगल में एक शेर अपने तीन सहायकों के साथ रहता था- एक सियार, एक कौवा और एक तेंदुआ। जंगल के राजा के साथ रहने के कारण, उन सहायकों को भोजन के लिए कभी सोचना नहीं पड़ता था। उन्हें जो भी शेर का बचा खुचा मिलता वे जाम कर खाते थे। एक दिन, वे तीन एक ऊंट को जंगल में घुमते देखकर आश्चर्यचकित हो गए, क्योंकि आमतौर पर ऊंट तो रेगिस्तान में रहते हैं। पूछताछ करने पर, उन्हें पता चला कि ऊंट ने अपना रास्ता खो दिया है और शेर ने उसे आश्रय दिया और उसे जंगल में रहने की जगह दी है। इसलिए वह उस ऊंट को कहा भी नहीं सकते थे। एक दिन, शक्तिशाली शेर हाथियों के साथ लड़ाई में घायल हो गया वह शिकार करने में असमर्थ था, शेर और उसके सहायकों को भूख लगी थी। तीनों सहायकों ने सुझाव दिया कि उन्हें ऊंट को खा लेना चाहिए, लेकिन शेर ने उसे मारने से इनकार कर दिया क्योंकि यह ऊंट के साथ धोखा होता। सियार, कौवा, और तेंदुए ने ऊंट को अपने रक्षक के लिए भोजन के रूप में प्रस्तुत करने की योजना बनाई जिसमें कौवा, तेंदुआ और गधा तीनों ने एक-एक करके स्वयं को शेर को भोजन के रूप में पेश किया। उन सभी को शेर ने मार कर खाने से इनकार कर दिया। यह देखकर, ...

बौने और मोची की ज्ञानवर्धक कहानी

एक छोटे से शहर में एक मोची (जूते बनाने वाला) रहता था। कुछ कारण वश वह बहुत ही  गरीब हो चुका था  और उसके पास नए जूते बनाने के लिए और चमड़ी भी बहुत कम था। उसके पास बस एक आख़िरी चमड़ी का टुकड़ा था। वह मोची और उसकी पत्नी बहुत ही चिंतित थे क्योंकि उनके जीवन यापन के लिए बस जूते बनाने का  रोज़गार ही एकमात्र  साधन था। हर दिन की तरह मोची ने आख़िरी बार उस बचे चमड़ी के टुकड़े की कटाई की और वह अपने घर लौट गया। उसने सोचा अगले दिन सुबह वह जूता बनाएगा और उसे बेचेगा। अगले  दिन सुबह  जब मोची अपनी दुकान पहुंचा तो वह देखकर आश्चर्यचकित रह गया क्योंकि उसके जूते बनाने की टेबल पर एक जोड़ी सुंदर जूते रखे हुए हैं। वह जूते इतनी सुंदर तरीके से बनाए गए थे जितना की उस मोची को भी अच्छे से बनाना नहीं आता था। मोची  बहुत खुश हुआ  और उसने उस जूते को बाजार में बेचकर अच्छा पैसा कमाया। उसने उसमें से कुछ पैसों से घर के लिए खाने पीने का सामान लिया और बाकी बचे पैसों से, और चमड़ी ख़रीदा । पिछले दिन की तरह है मोची ने चमड़ी को जूतों के आकार में काट लिया और दुकान की टेबल में छोड़कर चला गया। अ...

सियार और ढोल: पंचतंत्र कहानी

एक बार की बात है एक जंगल के पास दो राज्य के राजाओं की सेनाओं के बीच घमासान युद्ध हुआ। युद्ध में एक राजा जीत गया और दूसरा हार गया। उसके बाद सेनाएं अपने-अपने राज्य वापस लौट गई। युद्ध के क्षेत्र में बस एक ढोल पड़ा रह गया। यह वह ढोल था जो सेना के भांड व चारण बजा बजाकर रात के समय सेना को वीरता की कहानियां सुनाया करते थे। एक दिन उसी जगह पर बहुत तेज़ आंधी तूफान आई। तेज़ हवा चलने के कारण पड़ा हुआ ढोल उड़कर एक पेड़ के पास जाकर अटक गया। उसी पेड़ की सुखी डालियां ढोल से इस तरह सट गई थी की तेज़ हवा चलती थी ढमाढम-ढमाढम की आवाज़ सुनाई देती थी। एक दिन एक सियार उसी जगह पर घूमते-घामते पहुंचा। उसने जब ढोल की आवाज सुनी तो वह डर सा गया। ऐसी अजीब आवाज़ उसने कभी भी नहीं सुनी थी। वह सोचने लगा कि यह किसी नए प्रकार के जानवर की आवाज़ है। वह मन ही मन सोचने लगा ऐसी ढमाढम-ढमाढम की आवाज़ करने वाला जानवर तो बहुत ही खतरनाक होगा। सियार उस ढोल को गौर से देखने लगा और जानवर समझ के आवाज़ को और ध्यान से सुनने लगा। तभी एक गिलहरी कूदकर ढोल के ऊपर बैठा और एक बीज कुतरने लगा। यह देख कर सियार सोचने लगा- अच्छा तो यह जानवर...

मूर्ख साधू और ठग: पंचतंत्र की कहानी

पौराणिक काल की बात है एक गाँव के मंदिर में एक बहुत ही प्रसिद्ध साधू रहता था। उनका नाम था देव शर्मा था। उस गाँव में सभी उस साधू का सम्मान करते थे और दान-दक्षिणा में बहुत, कपड़े, खाद्य सामग्री, उपहार और धन देते थे। दान के सामग्रियों को बेच-बेच कर साधू के पास बहुत धन एकत्रित हो गया था। वह अपने पैसों को एक पोटली में बांध कर अपने साथ रखता था। साधू ज्ञानी होने के साथ-साथ बहुत चालाक भी था। वह धन के चोरी के डर से किसी भी व्यक्ति पर भरोसा नहीं करता था। उसका कोई परिवार और रिश्तेदार भी नहीं था इसलिये वह अपने पैसों की सुरक्षा के लिए बहुत चिंता भी करता था। वह जहां कहीं भी जाता अपने धन की पोटली को साथ ले कर जाता था। उसी गाँव में एक ठग आदमी भी था। उसकी नज़र बहुत दिनों से साधू के धन पर थी। पर साधू जहां जाता पैसों की पोटली ले कर जाता था जिसके कारण वह ठग उसे लूट या चुरा नहीं पा रहा था। आखिरकार उस ठग ने एक योजना बनाई। एक दिन वह ठग एक साधारण व्यक्ति के रूप में उस साधू के पास पहुँच। वहाँ पहुंचते ही उसने साधू के पैर पकड़ लिए और अपना शिष्य बनने की मिन्नत करने लगा। पहले साधू ने मना कर दिया परंतु बाद में उस ठग...